दो दशकों से बंद आदिवासी बालिका छात्रावास को शुरू कराने के लिए जिप सदस्य ने लिखा उपायुक्त को पत्र

दो दशकों से बंद आदिवासी बालिका छात्रावास को शुरू कराने के लिए जिप सदस्य ने लिखा उपायुक्त को पत्र

author Akram Ansari
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#बरवाडीह #आदिवासी_छात्रावास : दो दशक पुराने जर्जर छात्रावास का जीर्णोद्धार होने के बाद इसे शुरू करने की मांग उठी।

बरवाडीह प्रखंड मुख्यालय में दो दशक पहले निर्मित आदिवासी बालिका छात्रावास को क्रियाशील बनाने के लिए जिला परिषद सदस्य संतोषी शेखर ने उपायुक्त को पत्र लिखा है। जिला परिषद के माध्यम से हाल ही में इस जर्जर भवन का जीर्णोद्धार कराया गया है। इस छात्रावास के शुरू होने से किराए के कमरों में रहने वाली आदिवासी छात्राओं को बड़ी राहत मिलेगी।

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  • बरवाडीह प्रखंड मुख्यालय में लगभग दो दशक पूर्व निर्मित आदिवासी बालिका छात्रावास को अब तक शुरू नहीं किया जा सका है।
  • जिला परिषद सदस्य संतोषी शेखर ने छात्रावास में नामांकन प्रक्रिया शुरू करने को लेकर उपायुक्त को पत्र सौंपा।
  • लंबे समय से पूरी तरह जर्जर हो चुके इस छात्रावास भवन का हाल ही में जिला परिषद के सहयोग से जीर्णोद्धार हुआ है।
  • छात्रावास का संचालन न होने से स्थानीय गरीब आदिवासी छात्राओं को किराए के मकानों में रहकर पढ़ाई करनी पड़ रही है।
  • पत्र में कल्याण विभाग द्वारा वार्डन और सुरक्षा गार्ड की नियुक्ति प्रक्रिया शीघ्र पूरी कर संचालन शुरू करने की मांग की गई है।

झारखंड के लातेहार जिले के अंतर्गत आने वाले बरवाडीह प्रखंड से आदिवासी समाज की बेटियों की शिक्षा और उनके अधिकारों से जुड़ी एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। प्रखंड मुख्यालय में करीब दो दशक यानी बीस वर्ष पूर्व निर्मित आदिवासी बालिका छात्रावास प्रशासनिक उदासीनता और विभागीय अनदेखी के कारण अब तक शुरू नहीं हो सका है। इसके कारण सुदूर ग्रामीण इलाकों से आने वाली आदिवासी छात्राओं को भारी आर्थिक तंगी और असुरक्षा के बीच किराए के मकानों में रहकर शिक्षा ग्रहण करनी पड़ रही है। इस गंभीर समस्या को देखते हुए क्षेत्र की जिला परिषद सदस्य संतोषी शेखर ने कड़ा रुख अपनाया है और उपायुक्त को पत्र लिखकर इस छात्रावास को तत्काल चालू करने का आग्रह किया है।

दो दशकों का लंबा इंतजार और आदिवासी बेटियों का कठिन संघर्ष

बरवाडीह प्रखंड एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है, जहां के ग्रामीण इलाकों से सैकड़ों लड़कियां उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रखंड मुख्यालय आती हैं। इन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की बेटियों को बेहतर आवास और सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से ही लगभग बीस साल पहले एक भव्य आदिवासी बालिका छात्रावास का निर्माण कराया गया था। लेकिन प्रशासनिक सुस्ती का आलम यह रहा कि निर्माण पूरा होने के बाद भी इस छात्रावास के कमरों के ताले आज तक नहीं खोले जा सके।

छात्रावास के बंद रहने का सबसे बुरा असर यहां की छात्र-छात्राओं, विशेषकर आदिवासी बालिकाओं की शिक्षा पर पड़ा है। सुदूर गांवों से आने वाली इन छात्राओं के पास शहर में रहने का कोई सरकारी विकल्प नहीं था। नतीजतन, उन्हें प्रखंड मुख्यालय में महंगे दामों पर किराए के छोटे-छोटे कमरों में रहना पड़ रहा है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए हर महीने कमरे का किराया, बिजली का बिल और अन्य खर्च उठाना बेहद मुश्किल साबित हो रहा है। कई बार तो आर्थिक तंगी के कारण बेटियों को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ती है, जो कि महिला सशक्तिकरण के सरकारी दावों पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।

जिला परिषद द्वारा जीर्णोद्धार और बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता

बीस वर्षों तक खाली पड़े रहने और समय पर रखरखाव न होने के अभाव में यह महत्वपूर्ण छात्रावास भवन पूरी तरह से जर्जर और खंडहर में तब्दील होने लगा था। भवन के खिड़की-दरवाजे टूट चुके थे और दीवारें भी खराब हो चुकी थीं। इस बदहाली को देखते हुए स्थानीय जिला परिषद ने मामले का संज्ञान लिया और अपने विकास फंड के माध्यम से हाल ही में इस जर्जर छात्रावास का पूरी तरह से जीर्णोद्धार कराया। अब यह छात्रावास परिसर पूरी तरह से सज-धजकर दुरुस्त हो चुका है और रहने योग्य बन चुका है।

इस पूरे मामले का एक पहलू यह भी है कि छात्रावास को संचालित करने के लिए पूर्व में ही सरकारी स्तर पर आवश्यक बुनियादी सामग्रियों की व्यवस्था कर ली गई थी। छात्राओं के रहने के लिए बेड, टेबल, कुर्सियां और अन्य जरूरी सामान बहुत पहले ही खरीदे जा चुके हैं, जो वर्तमान में उपयोग न होने के कारण बंद पड़े हैं। जब बुनियादी ढांचा और भौतिक सामग्रियां पूरी तरह उपलब्ध हैं, तो अब केवल प्रशासनिक आदेश और आवश्यक जनशक्ति की तैनाती की ही कमी रह गई है, जिसे पूरा करने के लिए अब दबाव बनाया जा रहा है।

नामांकन प्रक्रिया और कर्मियों की नियुक्ति के लिए जिप सदस्य की मांग

इस पूरे मामले को लेकर जिला परिषद सदस्य संतोषी शेखर ने उपायुक्त को लिखे अपने आधिकारिक पत्र में छात्राओं की दिक्कतों को प्रमुखता से उठाया है। उन्होंने मांग की है कि चूंकि अब भवन पूरी तरह तैयार है, इसलिए आगामी शैक्षणिक सत्र को ध्यान में रखते हुए छात्राओं के नामांकन की प्रक्रिया अविलंब शुरू की होनी चाहिए। इससे बेटियों को किराए के मकानों से मुक्ति मिलेगी और वे एक सुरक्षित वातावरण में अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगी।

जिला परिषद सदस्य संतोषी शेखर ने कहा: “छात्रावास परिसर पूरी तरह से दुरुस्त हो चुका है तथा इसके लिए पूर्व में बेड समेत कई आवश्यक सामग्रियों की खरीदारी भी की जा चुकी है। अब आवश्यकता इस बात की है कि छात्रावास के सुचारू संचालन के लिए कल्याण विभाग के माध्यम से वार्डन और सुरक्षा गार्ड की नियुक्ति प्रक्रिया शीघ्र पूरी की जाए। इन कर्मियों की तैनाती होते ही छात्रावास का संचालन जल्द शुरू कराया जाए, ताकि क्षेत्र की गरीब और प्रतिभावान छात्राओं को इसका सीधा लाभ मिल सके।”

जिप सदस्य ने उम्मीद जताई है कि जिला प्रशासन इस पत्र पर त्वरित संज्ञान लेते हुए कल्याण विभाग को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करेगा, ताकि दो दशकों का यह लंबा और कष्टदायी इंतजार अब समाप्त हो सके और बेटियों को उनका हक मिल सके।

न्यूज़ देखो: व्यवस्था की कछुआ चाल और वादों की हकीकत

बरवाडीह की यह जमीनी हकीकत हमारे सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। जो योजना बीस साल पहले आदिवासी समाज की बेटियों को संबल देने के लिए बनी थी, वह दो दशकों तक फाइलों और बंद कमरों में कैद रही। एक तरफ सरकार ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और आदिवासी कल्याण के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ धरातल पर बनी-बनाई इमारतें रखरखाव के अभाव में दोबारा मरम्मत की मोहताज हो जाती हैं। क्या जिम्मेदार अधिकारियों ने कभी उन बेटियों की तकलीफ को महसूस किया जो पाई-पाई जोड़कर किराए के मकानों में रहने को विवश हैं? अब जबकि जिला परिषद ने भवन को दुरुस्त कर दिया है, तब भी वार्डन और गार्ड की नियुक्ति जैसे तकनीकी कारणों से इसे लटकाए रखना न्यायसंगत नहीं है। प्रशासन को अब बिना किसी देरी के इस दिशा में कदम उठाना चाहिए।
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।

बेटियों को मिले सुरक्षित परिवेश तभी बढ़ेगा हमारा देश

समाज का वास्तविक विकास तब तक संभव नहीं है जब तक हमारी बेटियां शिक्षा के अधिकार से वंचित रहेंगी या उन्हें पढ़ने के लिए असुरक्षित और कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा। बरवाडीह का यह आदिवासी बालिका छात्रावास केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं है, बल्कि यह इस क्षेत्र की सैकड़ों ग्रामीण बेटियों की उम्मीदों और सपनों का आशियाना है। एक जागरूक समाज के रूप में हमारा यह दायित्व है कि हम अपनी बेटियों की शिक्षा और सुरक्षा के हक में उठने वाली हर आवाज का समर्थन करें। जब नीतियां सही समय पर धरातल पर उतरेंगी, तभी आदिवासी समाज की बेटियों की राष्ट्र निर्माण में अग्रणी भूमिका सुनिश्चित हो सकेगी। आइए, इस मुहिम का हिस्सा बनें और अपनी आवाज बुलंद करें।

क्या आपके आस-पास भी कोई सरकारी हॉस्टल, स्कूल या अस्पताल इसी तरह प्रशासनिक लापरवाही के कारण बंद पड़ा है? इस गंभीर विषय पर अपनी राय और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमसे साझा करें। इस खबर को ज्यादा से ज्यादा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर शेयर करें ताकि बरवाडीह की बेटियों की यह गुहार रांची के आला अधिकारियों और सरकार के कानों तक पहुंच सके और इस व्यवस्था में सकारात्मक सुधार आ सके।

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बरवाडीह, लातेहार

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